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मगध पोस्ट एक्सक्लूसिव गजना धाम औरंगाबाद: जहां निराकार रूप में पूजी जाती हैं मां, विज्ञान भी नहीं सुलझा पाया प्रसाद का रहस्य

Published: October 30, 2026, 10:57 pm
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औरंगाबाद (बिहार): भारत रहस्यों और चमत्कारों का देश है। यहां कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जिनकी महिमा विज्ञान की समझ से भी परे है। ऐसा ही एक जागृत और रहस्यमयी शक्तिपीठ बिहार और झारखंड की सीमा पर स्थित है— ‘गजना धाम’। औरंगाबाद जिले के नवीनगर प्रखंड में कररबार नदी के शांत तट पर बसा यह प्राचीन धाम लाखों श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का केंद्र है।

यहां गजानन माता (मां गजना) की पूजा किसी मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि ‘निराकार’ (बिना किसी आकार के) रूप में होती है। आइए, जानते हैं गजना धाम के उन चमत्कारों, ऐतिहासिक रहस्यों और अनसुनी कहानियों के बारे में, जो इसे पूरे भारत में एक अनूठा तीर्थ स्थल बनाती है।


विज्ञान को चुनौती देता मां का चमत्कारिक प्रसाद

गजना धाम की सबसे बड़ी विशेषता और चमत्कार यहां का प्रसाद है। आम जीवन में हम और आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि मात्र 250 ग्राम घी में डेढ़ किलो (1.5 किग्रा) आटे की पूड़ियां छन सकती हैं, लेकिन गजना धाम में यह हर दिन होता है।

मां को भोग लगाने के लिए किसी धातु के बर्तन का नहीं, बल्कि ‘मिट्टी की कढ़ाही’ का उपयोग किया जाता है। मात्र 250 ग्राम घी डालकर इस मिट्टी की कढ़ाही में पूरे डेढ़ किलो आटे की गर्मागर्म पूड़ियां तैयार की जाती हैं। यह कढ़ाही न तो आग की तेज आंच से चटकती है और न ही घी कम पड़ता है। बाद में इन पूड़ियों को गुड़ के साथ मिलाकर मां गजना (वन देवी) को भोग लगाया जाता है। मंदिर के महंत और श्रद्धालुओं के लिए यह कोई जादू नहीं, बल्कि मां की साक्षात कृपा है।

एक चरवाहे को मिले गणेश और ऐसे पड़ा ‘गजना’ नाम

आखिर इस जगह का नाम गजना धाम कैसे पड़ा? इसके पीछे एक बेहद रोचक पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में यह पूरा इलाका एक घना जंगल था। एक दिन एक चरवाहा यहां अपनी गायें चरा रहा था, तभी उसे काले पत्थर से बनी भगवान गणेश की एक अद्भुत प्रतिमा मिली। यह प्रतिमा किसी ने तराशी नहीं थी, बल्कि यह ‘स्वयंभू’ (स्वयं प्रकट हुई) थी।

भगवान गणेश को ‘गजवदन’ (हाथी के मुख वाले) कहा जाता है। इसी गजवदन के नाम पर इस स्थान का नाम पड़ा, जो समय के साथ अपभ्रंश होकर लोगों की जुबान पर ‘गजना’ धाम बन गया।

आदि मानवों के रहस्य से लेकर खरवार राजाओं के साम्राज्य तक

गजना धाम का इतिहास केवल कुछ सौ सालों का नहीं है, इसके तार हजारों साल पुराने इतिहास से जुड़े हैं:

  • आदि मानव और पोलडीह का ‘गढ़’: धाम के समीप स्थित पोलडीह गांव में आज भी प्राचीन काल के अवशेष (गढ़) मौजूद हैं। खुदाई में अक्सर प्राचीन प्रतिमाएं मिलती हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि यह क्षेत्र कभी आदि मानवों और प्राचीन सभ्यताओं का केंद्र रहा होगा।
  • खरवार राजाओं की कुलदेवी ‘चेड़ीमाई’: लगभग 800 वर्ष पूर्व, चेर शासकों के आने से पहले यह पूरा इलाका जपला के खरवार राजाओं की राजधानी था। वे घने जंगलों में अपनी कुलदेवी ‘चेड़ीमाई’ की पूजा करते थे। कई लोग मानते हैं कि मां गजना उन्हीं चेड़ीमाई का ही स्वरूप हैं।
  • देवासुर संग्राम और बंगाल कनेक्शन: 12वीं शताब्दी में जब यहां बंगाल के राजाओं का राज था, तब शैव संप्रदाय के लोग सूर्य उपासना का ‘गाजन पर्व’ मनाते थे। वक्त के साथ सूर्य की यह आदिम पूजा मातृशक्ति ‘गजना माता’ की उपासना में बदल गई। कुछ कथाएं तो इस धाम को सीधे ‘देवासुर संग्राम’ (देवताओं और असुरों के युद्ध) से भी जोड़ती हैं।

बकरे की ‘मुड़ी’ (सिर) पर विवाद और बलि प्रथा का अंत

वर्तमान में मन्नत पूरी होने पर भक्त यहां मां को मिट्टी के हाथी और घोड़े चढ़ाते हैं। लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। पहले यहां जानवरों की बलि देने की प्रथा थी।

स्थानीय जानकारों के मुताबिक, जब भी यहां बकरे की बलि दी जाती थी, तो उसके कटे हुए सिर (मुड़ी) को लेकर श्रद्धालुओं के बीच भारी झगड़ा और विवाद हो जाता था। आए दिन होने वाले इस खून-खराबे और विवाद से दुखी होकर पंडित मुखदेव दास ने ग्रामीणों के साथ बैठक की और इस हिंसक बलि प्रथा को हमेशा के लिए बंद करवा दिया। तब से यहां पूरी तरह सात्विक पूजा होती है।

खपड़ैल की झोपड़ी से ‘राजकीय महोत्सव’ तक का सफर

सदियों तक मां गजना एक छोटी सी खपड़ैल (मिट्टी और खपड़े) की झोपड़ी में विराजमान थीं। साल 1965 में परम भक्त जगन्नाथ सिंह उर्फ ‘त्यागी जी’ ने ग्रामीणों के सहयोग से इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया और इसे पक्के मंदिर का रूप दिया।

गजना धाम मंदिर, औरंगाबाद

आज गजना धाम की ख्याति इतनी बढ़ चुकी है कि बिहार सरकार ने इसे ‘पर्यटन स्थल’ का आधिकारिक दर्जा दे दिया है।

  • 3 करोड़ 74 लाख का विकास फंड: पर्यटन विभाग ने मंदिर परिसर के विकास और सौंदर्यीकरण के लिए ₹3.74 करोड़ स्वीकृत किए हैं। यहां भव्य प्रवेश द्वार, आधुनिक मंच, ग्रीन रूम, विवाह मंडप, गेस्ट हाउस और हाई-टेक पार्किंग का निर्माण हो रहा है।
  • राजकीय गजना महोत्सव: हर साल बिहार कला एवं संस्कृति विभाग और औरंगाबाद जिला प्रशासन के सहयोग से यहां दो दिवसीय ‘राजकीय गजना महोत्सव’ का आयोजन होता है, जहां ‘इंडियन आइडल’ जैसे मंचों के राष्ट्रीय कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। चैत पूर्णिमा, नवरात्रि और रामनवमी पर यहां 9 दिनों तक रामलीला और विशाल मेला भी लगता है।

कैसे पहुंचें गजना धाम?

प्रकृति की गोद में बसे इस चमत्कारी धाम तक पहुंचना अब बेहद आसान है:

  • बिहार से मार्ग: यदि आप बिहार के रास्ते आ रहे हैं, तो औरंगाबाद जिला मुख्यालय से अंबा होते हुए नवीनगर मार्ग के जरिए सीधे गजना धाम पहुंचा जा सकता है।
  • झारखंड से मार्ग: पड़ोसी राज्य झारखंड के पलामू या जपला से भी श्रद्धालु सड़क मार्ग द्वारा आसानी से गजना धाम आ सकते हैं।

गजना धाम केवल एक मंदिर नहीं है; यह राजाओं के इतिहास, प्रकृति (वन देवी) की ऊर्जा और भक्ति के अटूट चमत्कारों का जीता-जागता प्रमाण है। यदि आप ऐतिहासिक रहस्यों और आध्यात्मिक शांति की तलाश में हैं, तो बिहार-झारखंड सीमा पर स्थित मां गजना का यह दरबार आपके लिए एक अकल्पनीय अनुभव साबित होगा।