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मगध पोस्ट एक्सक्लूसिव NH-139 पर ‘हादसों का सफर’: कब खत्म होगा मौतों का सिलसिला और फोरलेन का इंतजार?

Published: October 31, 2026, 11:48 pm
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पटना/अरवल/औरंगाबाद। पटना से औरंगाबाद होते हुए झारखंड के मेदिनीनगर तक जाने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग-139 (NH-139) आज दक्षिण बिहार के सबसे महत्वपूर्ण, लेकिन सबसे अधिक परेशानी पैदा करने वाले सड़क मार्गों में शामिल हो गया है। कभी क्षेत्रीय विकास, व्यापार और आवागमन की जीवनरेखा माने जाने वाले इस राजमार्ग पर अब सफर करना कई जगहों पर जोखिम उठाने जैसा हो गया है। संकरी सड़क, भारी वाहनों का दबाव, बेतरतीब ओवरटेकिंग, सड़क किनारे अतिक्रमण और दुर्घटना संभावित मोड़ों ने इस मार्ग को हादसों का केंद्र बना दिया है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इस सड़क पर प्रतिदिन 21 हजार से अधिक पैसेंजर कार यूनिट (PCU) का यातायात दबाव बताया जा रहा है, तो फिर इसका समुचित चौड़ीकरण अब तक क्यों नहीं हो पाया? अरवल और दाउदनगर में बाईपास निर्माण की योजनाएं आगे बढ़ रही हैं, लेकिन मुख्य राजमार्ग के बड़े हिस्से पर फोरलेन निर्माण को लेकर स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है।

स्थानीय लोगों की मांग भी अब केवल गड्ढों की मरम्मत या कुछ स्थानों पर सड़क चौड़ी करने तक सीमित नहीं है। उनकी मांग है कि नौबतपुर से औरंगाबाद होते हुए झारखंड सीमा तक पूरे मार्ग को योजनाबद्ध तरीके से फोरलेन बनाया जाए, ताकि इस सड़क पर होने वाली दुर्घटनाओं और जाम की समस्या का स्थायी समाधान निकल सके।

339 किलोमीटर का महत्वपूर्ण मार्ग, लेकिन क्षमता से कहीं अधिक यातायात

NH-139 बिहार और झारखंड के बीच सड़क संपर्क का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। लगभग 339 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर का बिहार वाला हिस्सा पटना के नौबतपुर क्षेत्र से शुरू होकर अरवल, पालीगंज, कलेर, दाउदनगर और औरंगाबाद होते हुए आगे झारखंड के मेदिनीनगर की दिशा में जाता है।

यह मार्ग केवल स्थानीय यात्रियों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि अंतरराज्यीय माल ढुलाई, व्यावसायिक परिवहन और औद्योगिक गतिविधियों के लिहाज से भी इसकी अहम भूमिका है। औरंगाबाद में NH-19 से जुड़ाव के कारण यह क्षेत्र को वाराणसी-कोलकाता सड़क नेटवर्क से भी जोड़ता है।

इस सड़क पर यातायात का स्वरूप काफी जटिल है। एक ओर सोन नदी के घाटों से बालू और गिट्टी लेकर चलने वाले भारी ट्रक तथा ट्रिपलर हैं, तो दूसरी ओर लंबी दूरी की यात्री बसें, निजी कारें, स्थानीय ऑटो, बाइक और साइकिल सवार भी इसी सड़क का इस्तेमाल करते हैं। कई स्थानों पर पैदल यात्रियों को भी तेज रफ्तार वाहनों के बीच से गुजरना पड़ता है।

यही असंतुलित वाहन मिश्रण दुर्घटनाओं का बड़ा कारण बन रहा है। भारी वाहनों की गति और आकार के मुकाबले छोटे वाहनों के लिए पर्याप्त सुरक्षित जगह नहीं है। कई जगह सड़क की चौड़ाई इतनी कम है कि एक वाहन को ओवरटेक करने के दौरान सामने से आने वाले वाहन के लिए पर्याप्त जगह नहीं बचती।

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की 118वीं पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप अप्रूवल कमेटी (PPPAC) की बैठक से संबंधित उपलब्ध विवरण में इस क्षेत्र के यातायात दबाव को 21,000 से अधिक PCU प्रतिदिन बताया गया है। इसी प्रक्रिया में सासाराम-औरंगाबाद-पटना एलाइनमेंट के लगभग 188 किलोमीटर हिस्से में घनी आबादी और शहरी गतिविधियों (Built Up Areas) से उत्पन्न चुनौतियों का भी उल्लेख है।

इसका मतलब साफ है कि समस्या केवल सड़क की चौड़ाई तक सीमित नहीं है। शहरी विस्तार, सड़क किनारे दुकानें, स्थानीय आवागमन और भारी वाहनों की आवाजाही ने इस राजमार्ग की परिचालन क्षमता पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है।

सात ब्लैकस्पॉट, जहां हर समय बना रहता है हादसे का खतरा

NH-139 पर दुर्घटनाओं की समस्या का सबसे गंभीर पहलू इसके संवेदनशील दुर्घटना स्थलों की संख्या है। मेहंदीया से दाउदनगर के बीच सड़क सुरक्षा को लेकर विशेष चिंता जताई गई है।

राजकीय अभियंत्रण कॉलेज, अरवल (Government  Engineering College, Arwal) के छात्रों द्वारा इस सड़क पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार, मेहंदीया से दाउदनगर के बीच लगभग 22.6 किलोमीटर के हिस्से में प्रतिवर्ष 20 से 26 गंभीर दुर्घटनाएं होने की बात सामने आई है। यह आंकड़ा इस छोटे से सड़क खंड पर मौजूद सुरक्षा संबंधी खामियों की गंभीरता को दर्शाता है।

उनके इस अध्ययन में इस मार्ग पर सात प्रमुख ब्लैकस्पॉट चिह्नित किए गए हैं:

  1. मेहंदीया
  2. बेलसार
  3. कलेर (अमीर बिगहा)
  4. ठाकुर बिगहा
  5. अगनूर
  6. शमशेरनगर
  7. दाउदनगर (भाखरुआ मोड़)

इन स्थानों पर सड़क की बनावट, यातायात का दबाव, स्थानीय आबादी की आवाजाही और वाहनों की तेज रफ्तार मिलकर दुर्घटना का खतरा बढ़ाते हैं।

औरंगाबाद जिले में पिछले दस वर्षों के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में 2,500 से अधिक लोगों की मौत का आंकड़ा भी चिंता बढ़ाने वाला है। उपलब्ध अध्ययन में NH-139 के औरंगाबाद खंड पर प्रतिवर्ष औसतन 200 मौतों और 500 से अधिक गंभीर रूप से घायल होने के दावे किए गए हैं। हालांकि, ये आंकड़े आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं किए गए हैं।

NH-139 पर हादसों का सिलसिला: 2026 की प्रमुख दुर्घटनाएँ

पटना–अरवल–औरंगाबाद मार्ग पर स्थित NH-139 पर वर्ष 2026 के दौरान कई गंभीर सड़क हादसे सामने आए। इन दुर्घटनाओं में सरकारी कर्मचारी, वाहन चालक, राहगीर, महिलाएँ और बच्चे भी शामिल रहे। लगातार हो रहे हादसे इस मार्ग पर तेज रफ्तार, भारी वाहनों की आवाजाही, संकरे रास्तों और अपर्याप्त सड़क सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर समस्या को उजागर करते हैं।

2026 की प्रमुख सड़क दुर्घटनाएँ

10 फरवरी 2026 – मेहंदिया में परिवहन विभाग के सिपाही की मौत

अरवल जिले के मेहंदिया थाना क्षेत्र में बालिदाद बाजार के पास वाहन जांच के दौरान तेज रफ्तार गिट्टी लदे ट्रक की टक्कर से परिवहन विभाग के सिपाही मुकेश कुमार (28) की मौत हो गई। हादसे में एक अन्य सिपाही, ट्रक चालक और मोटर वाहन निरीक्षक भी घायल हुए।

26 जून 2026 – मेहंदिया बाजार में बाइक सवार की मौत

NH-139 स्थित मेहंदिया बाजार के पास एक अज्ञात पिकअप वाहन ने बाइक सवार को टक्कर मार दी। दुर्घटना में बाइक सवार की मौत हो गई। घटना के बाद आक्रोशित ग्रामीणों ने मुआवजे और वाहन चालक की गिरफ्तारी की मांग को लेकर सड़क जाम कर दिया।

11 जुलाई 2026 – फतेहपुर संडा में ट्रक-ऑटो की टक्कर, चार की मौत

अरवल जिले के फतेहपुर संडा के पास एक तेज रफ्तार ट्रक ने यात्रियों से भरे ऑटो को टक्कर मार दी। इस दर्दनाक हादसे में चार लोगों की मौत हो गई, जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। घायलों को बेहतर इलाज के लिए पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर किया गया।

5 अगस्त 2026 – औरंगाबाद-पटना मार्ग पर दो ट्रकों में टक्कर, लगी आग

NH-139 पर औरंगाबाद-पटना मार्ग में दो ट्रकों की टक्कर के बाद आग लग गई। हादसे में एक ट्रक चालक गंभीर रूप से झुलस गया। दुर्घटना के कारण सड़क पर लगभग चार घंटे तक यातायात बाधित रहा।

23 अगस्त 2026 – मेहंदिया क्षेत्र में नौ वर्षीय बच्ची की मौत

अरवल के मेहंदिया क्षेत्र में सड़क किनारे खड़ी नौ वर्षीय रागिनी कुमारी को तेज रफ्तार एसयूवी ने कुचल दिया। बच्ची की मौके पर ही मौत हो गई। घटना के बाद स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए सड़क जाम कर दिया।

27 अगस्त 2026 – मदैला के पास दो पिकअप वाहनों की आमने-सामने टक्कर

मेहंदिया थाना क्षेत्र के मदैला गांव के पास NH-139 के एक तीखे मोड़ पर सब्जी लदे दो पिकअप वाहनों की आमने-सामने टक्कर हो गई। हादसे में एक चालक की मौत हो गई, जबकि दूसरा गंभीर रूप से घायल हो गया। दुर्घटना के कारण कुछ समय तक यातायात प्रभावित रहा।

25 सितंबर 2026 – दाउदनगर के पास ट्रक की चपेट में आने से बुजुर्ग महिला की मौत

दाउदनगर-पटना मुख्य मार्ग पर गैस एजेंसी के पास सड़क पार कर रही 72 वर्षीय महिला को ट्रक ने टक्कर मार दी। हादसे में उनकी मौत हो गई। घटना के बाद परिजनों और स्थानीय लोगों ने मुआवजे की मांग को लेकर NH-139 को लगभग दो घंटे तक जाम रखा।

9 अक्टूबर 2026 – औरंगाबाद में स्कूल शिक्षिका सड़क हादसे में घायल

औरंगाबाद में NH-139 पर एक अज्ञात वाहन की टक्कर से निजी विद्यालय की शिक्षिका गंभीर रूप से घायल हो गईं। प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें बेहतर इलाज के लिए पटना रेफर किया गया।

15 अक्टूबर 2026 – अंबा में दो बाइकों की आमने-सामने टक्कर, चार घायल

अंबा थाना क्षेत्र में जनता कॉलेज के गेट के पास NH-139 पर दो मोटरसाइकिलों की आमने-सामने टक्कर हो गई। हादसे में चार लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। सभी घायलों को इलाज के लिए सदर अस्पताल, औरंगाबाद ले जाया गया।

22 अक्टूबर 2026 – तरारी पुल के पास हिट एंड रन, दुकानदार की मौत

दाउदनगर अनुमंडल क्षेत्र में तरारी पुल के पास एक तेज रफ्तार अज्ञात वाहन ने पीछे से टक्कर मार दी। हादसे में 40 वर्षीय दुकानदार संतोष कुमार की मौत हो गई। दुर्घटना के बाद वाहन चालक मौके से फरार हो गया।

हादसों से उठते गंभीर सवाल

2026 की ये घटनाएँ बताती हैं कि NH-139 पर सड़क सुरक्षा की समस्या किसी एक स्थान तक सीमित नहीं है। मेहंदिया, अरवल, कलेर, अंबा, दाउदनगर और औरंगाबाद जैसे क्षेत्रों में लगातार दुर्घटनाएँ सामने आ रही हैं।

इस मार्ग पर भारी वाहनों और छोटे यात्री वाहनों की एक साथ आवाजाही, तेज रफ्तार, संकरे मोड़, आबादी वाले क्षेत्रों में अपर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था तथा पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग की कमी दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ाती है।

सबसे गंभीर चिंता यह है कि दुर्घटना के बाद अक्सर स्थानीय लोगों को सड़क जाम और प्रदर्शन का सहारा लेना पड़ता है। यह स्थिति सड़क सुरक्षा, आपातकालीन चिकित्सा सहायता और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है।

(नोट: यह डाटा प्रमुख समाचार पत्रों से संकलित किया गया है)

सड़क की बदहाली: केवल ड्राइवर की गलती नहीं, इंजीनियरिंग की भी समस्या

सड़क दुर्घटनाओं के बाद अक्सर तेज रफ्तार, लापरवाही और यातायात नियमों के उल्लंघन को जिम्मेदार ठहराया जाता है। ये कारण निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन NH-139 की समस्या को केवल वाहन चालकों की गलती बताकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इस मार्ग पर कई ऐसी अवसंरचनात्मक कमियां हैं, जिनका सीधा संबंध सड़क सुरक्षा से है।

1. संकरी सड़क और डिवाइडर का अभाव

21 हजार से अधिक PCU प्रतिदिन के कथित यातायात दबाव के बावजूद मार्ग के कई हिस्से अब भी दो लेन या उससे कम प्रभावी चौड़ाई में सीमित हैं। सड़क के बीच में निरंतर डिवाइडर का अभाव है। ऐसे में सामने से आने वाले वाहन को बचाने या ओवरटेक करने के दौरान गंभीर दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।

जहां सड़क के दोनों ओर घनी आबादी है, वहां स्थिति और भी खराब हो जाती है। स्थानीय वाहन, दुकानें, पैदल यात्री और हाईवे से गुजरने वाले भारी ट्रक एक ही जगह पर जगह के लिए संघर्ष करते हैं।

2. पालीगंज के जीतन छपरा में गड्ढों से परेशानी

पालीगंज के जीतन छपरा के पास सड़क की बदहाली को लेकर गंभीर शिकायतें सामने आई हैं। उपलब्ध विवरण में यहां 4 से 5 फीट तक गहरे गड्ढे होने का दावा किया गया है। इस कारण वाहनों की आवाजाही प्रभावित होती है और कई बार प्रतिदिन छह से सात घंटे तक जाम की स्थिति बन जाती है।

सोन नदी से बालू और गिट्टी लेकर चलने वाले भारी वाहनों का लगातार दबाव सड़क की सतह और निचली संरचनात्मक परतों को नुकसान पहुंचा सकता है। यदि निर्धारित धुरी भार से अधिक वजन लेकर वाहन चलते हैं, तो सड़क की उम्र तेजी से घटती है और गड्ढों की समस्या गंभीर होती जाती है।

फोटो: पटना प्रेस

ऐसे स्थानों पर केवल मिट्टी या सामान्य पैचवर्क से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। सड़क की संरचनात्मक स्थिति का परीक्षण कर आवश्यकतानुसार मजबूत पेवमेंट का निर्माण करना होगा।

3. बटाने नदी का पुल बना चिंता का विषय

औरंगाबाद क्षेत्र में बटाने नदी पर स्थित पुराने पुल की स्थिति भी चिंता का विषय बताई जा रही है। पुल के कंक्रीट गर्डरों और अन्य संरचनात्मक हिस्सों में दरारों की शिकायत के बाद भारी वाहनों के परिचालन पर प्रतिबंध लगाई गई है।

NH 139: दोमुहान पुल के पास बना डायवर्सन

आखिर क्यों जरूरी है NH-139 का फोरलेन निर्माण?

NH-139 पर फोरलेन निर्माण की मांग अब केवल राजनीतिक या स्थानीय जनभावना का विषय नहीं रह गई है। इसके पीछे यातायात क्षमता, सड़क सुरक्षा और क्षेत्रीय आर्थिक विकास से जुड़े ठोस तकनीकी कारण हैं।

सबसे पहले, वर्तमान यातायात दबाव को देखते हुए सड़क की क्षमता का वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक है। यदि किसी मार्ग पर उपलब्ध सड़क क्षमता की तुलना में यातायात अधिक है, तो वाहनों की गति घटती है, जाम बढ़ता है और दुर्घटना की आशंका भी बढ़ती है।

फोरलेन निर्माण से वाहनों को अलग-अलग लेन में चलने की सुविधा मिलेगी। सुरक्षित ओवरटेकिंग के लिए अतिरिक्त जगह उपलब्ध होगी और विपरीत दिशा से आने वाले वाहनों के बीच डिवाइडर बनाया जा सकेगा।

हालांकि, केवल चार लेन बना देना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ आधुनिक सड़क सुरक्षा मानकों को लागू करना भी जरूरी है।

फोरलेन परियोजना में इन व्यवस्थाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए:

  • पूरे मार्ग में आवश्यकतानुसार मजबूत और निरंतर केंद्रीय डिवाइडर।
  • घनी आबादी वाले क्षेत्रों में दोनों तरफ सर्विस रोड।
  • बाजार, स्कूल, अस्पताल और आबादी वाले क्षेत्रों में सुरक्षित प्रवेश एवं निकास व्यवस्था।
  • पैदल यात्रियों के लिए फुटपाथ, सुरक्षित क्रॉसिंग और आवश्यकता के अनुसार फुटओवर ब्रिज।
  • दुर्घटना संभावित मोड़ों पर बेहतर दृश्यता, संकेतक और प्रकाश व्यवस्था।
  • भारी वाहनों के लिए निर्धारित ले-बाय और पार्किंग स्थल।
  • ओवरलोडिंग रोकने के लिए स्वचालित वे-ब्रिज और निगरानी व्यवस्था।

विशेष रूप से सर्विस रोड का निर्माण महत्वपूर्ण है। वर्तमान में स्थानीय ऑटो, बाइक और अन्य धीमी गति के वाहन सीधे मुख्य राजमार्ग पर चलते हैं। इससे तेज रफ्तार ट्रकों और बसों के साथ उनका टकराव बढ़ता है। सर्विस रोड बनने से स्थानीय यातायात को मुख्य हाईवे से अलग किया जा सकेगा।

बाईपास के लिए करोड़ों की मंजूरी, लेकिन मुख्य सड़क का क्या होगा?

NH-139 के विकास को लेकर सबसे बड़ा सवाल सरकारी घोषणाओं और धरातल पर हो रहे काम के बीच का अंतर है।

पटना-आरा-सासाराम ग्रीनफील्ड कॉरिडोर (NH-119A) जैसी नई परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है। 118वीं PPPAC बैठक से संबंधित विवरण में इस परियोजना की लागत लगभग 3,712.40 करोड़ रुपये बताई गई है।

दूसरी ओर, NH-139 पर प्रतिदिन भारी यातायात दबाव झेलने वाले मुख्य मार्ग के पूर्ण फोरलेन चौड़ीकरण को लेकर अब भी स्पष्ट और समयबद्ध कार्ययोजना की आवश्यकता बनी हुई है।

अरवल और दाउदनगर बाईपास परियोजनाओं को लेकर भी महत्वपूर्ण घोषणाएं हुई हैं।

परियोजनाप्रस्तावित लागतउपलब्ध स्थिति
अरवल बाईपास₹665.50 करोड़12.3 किमी परियोजना; निविदा प्रक्रिया की जानकारी
दाउदनगर बाईपास₹288.28 करोड़स्वीकृति के बाद भूमि अधिग्रहण और निविदा संबंधी प्रक्रिया
औरंगाबाद अर्बन बाईपासराशि स्पष्ट नहींDPR मंत्रालय को भेजे जाने की जानकारी
नौबतपुर से झारखंड सीमा तक मुख्य NH-139समग्र लागत स्पष्ट नहींपूर्ण फोरलेन चौड़ीकरण की स्वीकृति और क्रियान्वयन की स्थिति स्पष्ट होना बाकी

इन परियोजनाओं के पूरा होने से अरवल और दाउदनगर जैसे शहरी इलाकों को राहत मिलने की उम्मीद है। शहरों के बीच से गुजरने वाले भारी वाहनों को बाईपास से निकालने पर स्थानीय जाम कम हो सकता है।

लेकिन सवाल यह है कि बाईपास बनने के बाद उनके बीच के मुख्य सड़क खंडों की स्थिति क्या होगी?

यदि नौबतपुर से पालीगंज, अरवल, कलेर, दाउदनगर और औरंगाबाद तक मुख्य मार्ग संकरा ही रहता है, तो यातायात की समस्या एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होती रहेगी। बाईपास शहरों को राहत दे सकते हैं, लेकिन वे पूरे राजमार्ग की क्षमता और सुरक्षा संबंधी समस्याओं का समाधान नहीं हैं।

इसलिए स्थानीय लोगों की मांग है कि बाईपास परियोजनाओं के साथ मुख्य NH-139 के फोरलेन चौड़ीकरण को भी प्राथमिकता दी जाए।

बालू और गिट्टी के ट्रकों का दबाव भी बड़ी चुनौती

इस राजमार्ग की समस्याओं में सोन नदी के घाटों से निकलने वाले बालू और गिट्टी के भारी वाहनों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

बड़ी संख्या में ट्रक और ट्रिपलर इस मार्ग से गुजरते हैं। इन वाहनों के कारण सड़क पर भारी धुरी भार पड़ता है। यदि निर्धारित सीमा से अधिक वजन लेकर वाहन चलते हैं, तो सड़क की संरचना को नुकसान पहुंचता है।

इसके अलावा, दिन के व्यस्त समय में भारी वाहनों की आवाजाही से छोटे वाहनों के लिए रास्ता निकालना मुश्किल हो जाता है। स्कूल जाने वाले बच्चों, कामकाजी लोगों, स्थानीय यात्रियों और बाजार जाने वाले लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

इस समस्या के समाधान के लिए प्रशासन को यातायात का वैज्ञानिक अध्ययन कर भारी वाहनों के लिए समयबद्ध परिचालन व्यवस्था लागू करनी चाहिए। जहां संभव हो, व्यस्त समय में भारी वाहनों की आवाजाही नियंत्रित की जाए और निर्धारित रूट तथा समय का सख्ती से पालन कराया जाए।

साथ ही, ओवरलोडिंग पर रोक लगाने के लिए वे-ब्रिज, सीसीटीवी और डिजिटल चालान प्रणाली को प्रभावी बनाया जाना चाहिए।

हादसे रोकने के लिए फोरलेन बनने तक क्या हो?

फोरलेन निर्माण एक बड़ी परियोजना है। इसमें DPR, भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय स्वीकृति, वित्तीय मंजूरी और निर्माण प्रक्रिया में समय लग सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तब तक सड़क सुरक्षा के उपायों को टाल दिया जाए।

सरकार और स्थानीय प्रशासन को तत्काल कुछ कदम उठाने चाहिए।

पहला, सभी सात ब्लैकस्पॉट पर सुरक्षा इंतजाम। मेहंदीया, बेलसार, कलेर, ठाकुर बिगहा, अगनूर, शमशेरनगर और भाखरुआ मोड़ पर रिफ्लेक्टिव साइनेज, थर्मोप्लास्टिक रोड मार्किंग, कैट-आई, रंबल स्ट्रिप्स और पर्याप्त स्ट्रीट लाइट लगाई जाए। गति नियंत्रण के उपाय तकनीकी मानकों और सड़क की श्रेणी के अनुरूप हों।

दूसरा, जर्जर सड़क की प्राथमिकता के आधार पर मरम्मत। पालीगंज के जीतन छपरा जैसे गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हिस्सों की तत्काल तकनीकी जांच कर मजबूत पेवमेंट का निर्माण किया जाए। केवल अस्थायी मरम्मत से काम नहीं चलना चाहिए।

तीसरा, भारी वाहनों पर नियंत्रण। बालू और गिट्टी लदे ओवरलोडेड ट्रकों के खिलाफ नियमित जांच अभियान चलाया जाए। व्यस्त समय में भारी वाहनों की आवाजाही को स्थानीय यातायात और सड़क की क्षमता के अनुसार नियंत्रित किया जाए।

चौथा, आपातकालीन चिकित्सा सुविधा। अरवल और दाउदनगर के दुर्घटना संभावित क्षेत्रों में 24 घंटे एम्बुलेंस, प्राथमिक चिकित्सा सुविधा और क्रेन की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। गंभीर रूप से घायलों को नजदीकी ट्रॉमा सेंटर तक पहुंचाने के लिए स्पष्ट आपातकालीन व्यवस्था बनाई जाए।

पांचवां, पुलों की संरचनात्मक जांच। बटाने नदी समेत मार्ग के सभी पुराने पुलों का विशेषज्ञों से सुरक्षा ऑडिट कराया जाए। जिन पुलों की भार वहन क्षमता प्रभावित है, वहां आवश्यक प्रतिबंध और वैकल्पिक व्यवस्था की जाए।

जनता का सवाल: आखिर कब बनेगा पूरा फोरलेन?

NH-139 के चौड़ीकरण की मांग अब अरवल, औरंगाबाद और आसपास के क्षेत्रों में एक बड़ा सार्वजनिक मुद्दा बन चुकी है। स्थानीय नागरिक संगठनों और विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों ने भी इस विषय को उठाया है। राष्ट्रीय राजमार्ग संघर्ष समिति और सर्वदलीय स्तर पर हुए विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से मुख्य सड़क के चौड़ीकरण की मांग लगातार सामने आती रही है।

स्थानीय लोगों का तर्क है कि जब बिहार के कई जिला मुख्यालयों को बेहतर फोरलेन कनेक्टिविटी मिल रही है, तो अरवल और औरंगाबाद जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को इससे वंचित क्यों रखा जाए?

यह मांग केवल यात्रा को आसान बनाने की नहीं है। इसका संबंध लोगों की जान, व्यापार, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच से भी है।

किसी मरीज को पटना ले जाने वाली एम्बुलेंस यदि घंटों जाम में फंसी रहती है, तो यह केवल यातायात की समस्या नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच का सवाल बन जाता है। इसी तरह रोजाना इस सड़क से गुजरने वाले हजारों यात्रियों के लिए सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करना सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है।

अब घोषणाओं से आगे बढ़कर निर्माण की जरूरत

NH-139 की मौजूदा स्थिति सरकार और संबंधित निर्माण एजेंसियों के सामने एक गंभीर चुनौती पेश करती है। 21 हजार से अधिक PCU का दबाव, घनी आबादी वाले हिस्से, भारी मालवाहक वाहनों की आवाजाही, दुर्घटना संभावित स्थान और पुराने पुलों की स्थिति इस बात की मांग करते हैं कि पूरे कॉरिडोर का नए सिरे से तकनीकी मूल्यांकन किया जाए।

सबसे जरूरी है कि नौबतपुर से औरंगाबाद होते हुए झारखंड सीमा तक फोरलेन चौड़ीकरण के लिए स्पष्ट समयसीमा तय हो। परियोजना की DPR, लागत, भूमि अधिग्रहण, वित्तीय स्वीकृति और निर्माण एजेंसी से संबंधित जानकारी सार्वजनिक की जाए। साथ ही, अलग-अलग बाईपास परियोजनाओं को मुख्य राजमार्ग के विकास से जोड़कर एक समग्र योजना बनाई जाए।

आखिर सड़क का उद्देश्य केवल एक शहर को दूसरे शहर से जोड़ना नहीं, बल्कि सुरक्षित और सुगम यात्रा सुनिश्चित करना भी है।

NH-139 पर सफर करने वाले लोगों को अब एक और घोषणा नहीं, बल्कि जमीन पर चौड़ी और सुरक्षित सड़क चाहिए। अरवल, पालीगंज, कलेर, दाउदनगर और औरंगाबाद के लोग वर्षों से बेहतर सड़क की उम्मीद लगाए बैठे हैं। सवाल अब यह नहीं है कि इस मार्ग को फोरलेन बनाया जाना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि इसके निर्माण की प्रक्रिया कब शुरू होगी और लोगों को सुरक्षित सफर कब नसीब होगा?

पोल

NH 139 के फोर लेने बनने में हो रही देरी के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते है?

1 vote · Closes 30 Nov 2026, 8:22 am