औरंगाबाद/पलामू | भारतीय राजनीति में विकास के वादे कैसे ‘सियासी अखाड़े’ में तब्दील होकर दम तोड़ देते हैं, इसका सबसे बड़ा गवाह अगर कोई है, तो वह है बिहार और झारखंड की सीमा पर स्थित उत्तर कोयल जलाशय परियोजना (मंडल डैम) (North Koyal Dam Project)। 7 फरवरी 2026 को जब औरंगाबाद की डीएम अभिलाषा शर्मा नबीनगर में नहरों के निर्माण का जायजा लेने पहुंचीं, तो यह सिर्फ एक प्रशासनिक दौरा नहीं था; यह उस जबरदस्त राजनीतिक दबाव का नतीजा था जो दिल्ली से लेकर पटना और रांची तक महसूस किया जा रहा है, क्योंकि जून 2026 की ‘डेथलाइन’ अब सिर पर है।

1972: इंदिरा गांधी का सपना और 30 करोड़ की नींव
इस परियोजना की कहानी शुरू होती है 1972 में, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ और हरित क्रांति के दौर में इसकी नींव रखी थी। तब इसका बजट मात्र 30 करोड़ रुपये था और मकसद था एकीकृत बिहार के सबसे पिछड़े और सूखे इलाकों (पलामू, गया, औरंगाबाद) को पानी देना। यह कांग्रेस के लिए इस क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का एक बड़ा दांव था।
1990 का दशक: ‘मंडल-कमंडल’ की राजनीति और प्रोजेक्ट पर ब्रेक
जैसे-जैसे देश और बिहार की राजनीति बदली, इस प्रोजेक्ट का भाग्य भी बदल गया। 1990 के दशक में जब बिहार में क्षेत्रीय राजनीति हावी हुई, उसी समय पर्यावरण कानूनों ने भी जोर पकड़ा। 1993 में, वन विभाग ने पलामू टाइगर रिजर्व (PTR) के डूबने का हवाला देकर काम रुकवा दिया। यह वह दौर था जब विकास पर ‘जंगल और जानवर’ की राजनीति हावी हो गई।
1997 का खूनी अध्याय और नक्सलवाद का उदय
राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने इस क्षेत्र में एक शून्य पैदा कर दिया। अगस्त 1997 में, बैराज के गेट कथित तौर पर तकनीकी खामी या मानवीय भूल से बंद रह गए, जिससे आई बाढ़ में 20 से ज्यादा ग्रामीण मारे गए। इसके बाद उपजे आक्रोश को माओवादियों ने हवा दी। प्रोजेक्ट के मुख्य इंजीनियर की हत्या कर दी गई। जो बांध खेतों को पानी देने वाला था, वह ‘खूनी परियोजना’ बन गया और नेता इस क्षेत्र में जाने से भी कतराने लगे। यह परियोजना माओवाद प्रभावित क्षेत्र में राज्य की विफलता का प्रतीक बन गई।
झारखंड बनाम बिहार: पानी और विस्थापन की सियासत
साल 2000 में झारखंड अलग राज्य बना, और इसके साथ ही प्रोजेक्ट एक नए सियासी पेंच में फंस गया। बांध और डूब क्षेत्र (विस्थापन का दर्द) झारखंड के पलामू और गढ़वा हिस्से में आया, जबकि सिंचाई का बड़ा लाभ (पानी की मलाई) बिहार के औरंगाबाद और गया को मिलना था। झारखंड के नेताओं के लिए अपने आदिवासियों को विस्थापित कर बिहार को पानी देना राजनीतिक रूप से आत्मघाती कदम था, इसलिए सालों तक फाइलों को रांची में दबाए रखा गया।
2016: मोदी सरकार की एंट्री और ‘डबल इंजन’ का जोर
दशकों की धूल के बाद, 2016-17 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार ने इसे पुनर्जीवित किया। यह एक बड़ा राजनीतिक फैसला था, जिसका उद्देश्य बिहार और झारखंड दोनों में भाजपा के आधार को मजबूत करना था। सियासत और पर्यावरण के बीच एक ‘समझौता’ किया गया—बाघों को बचाने के लिए बांध की ऊंचाई कम की गई, भले ही इससे पानी का भंडारण कम हो गया। प्रधानमंत्री ने खुद 2019 के चुनाव से पहले इसका शिलान्यास कर इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया। अब लागत 30 करोड़ से बढ़कर 2,430 करोड़ रुपये के पार जा चुकी है।
2026: अंतिम लड़ाई और साख का सवाल
आज, 53 साल बाद, जब प्रशासन युद्धस्तर पर नहरों की लाइनिंग और पुलों का निर्माण कर रहा है, तो इसके पीछे एक मजबूरी है। जून 2026 की समय सीमा केंद्र सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक परीक्षा है। अगर यह परियोजना पूरी होती है, तो यह दशकों के सियासी पाप धोने जैसा होगा।

डीएम का सख्त निरीक्षण और अधिकारियों की फौज का साइट पर होना यह बताता है कि अब ‘फाइलों की राजनीति’ का समय खत्म हो चुका है, और अब ‘जमीन पर परिणाम’ दिखाने की राजनीतिक मजबूरी है।

