बिहार के राजनीतिक गलियारों में एक चौंकाने वाले और ऐतिहासिक घटनाक्रम के तहत, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने तीन दशक पुराने एक अभेद्य किले को ढहा दिया है। पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र (Teachers’ MLC Election) के बेहद हाई-प्रोफाइल मुकाबले में राजद उम्मीदवार डॉ. संजीव कुमार ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दिग्गज और कद्दावर नेता नवल किशोर यादव को एक हजार से अधिक मतों के अंतर से करारी शिकस्त दी है।
इस हार के साथ ही नवल किशोर यादव के राजनीतिक सफर का एक लंबा अध्याय समाप्त हो गया है। वे वर्ष 1996 से लगातार इस सीट पर पांच कार्यकाल से जीत दर्ज करते आ रहे थे और उनका यह दबदबा पूरे 30 साल तक कायम रहा। इस अप्रत्याशित नतीजे ने राज्य के राजनीतिक समीकरणों में नई हलचल पैदा कर दी है और यह स्पष्ट संकेत दे रहा है कि शिक्षकों और बुद्धिजीवी वर्ग का रुझान अब किस ओर बदल रहा है।
रोमांचक और कड़ा मुकाबला
सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा दांव पर लगे इस चुनाव में मतगणना के दौरान भारी गहमागहमी देखने को मिली। मतों की गिनती के बाद राजद प्रत्याशी डॉ. संजीव कुमार को 4,487 पहली वरीयता के वोट मिले, जबकि नवल किशोर यादव को 3,430 वोट ही प्राप्त हो सके। वहीं, जन सुराज पार्टी की उम्मीदवार डॉ. दिव्या ज्योति इस मुकाबले में तीसरे स्थान पर रहीं।

अपनी इस शानदार जीत के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए डॉ. संजीव कुमार ने अपनी जीत शिक्षकों के नाम समर्पित की। उन्होंने कहा कि यह जनादेश शिक्षकों की लंबे समय से लंबित समस्याओं, मानदेय और अधिकारों के प्रति व्यवस्था की उपेक्षा के खिलाफ एक मजबूत संदेश है। दूसरी ओर, भाजपा के इस सबसे सुरक्षित गढ़ के ढहने से एनडीए खेमे में स्थानीय स्तर पर असंतोष और जमीनी पकड़ को लेकर गहन मंथन शुरू हो गया है।
विधान परिषद में इसके राजनीतिक मायने
भाजपा को लगे इस तगड़े झटके के अलावा, इस चुनाव ने बिहार विधान परिषद के भीतर एक दिलचस्प पारिवारिक और राजनीतिक समीकरण भी खड़ा कर दिया है। डॉ. संजीव कुमार की इस जीत के बाद वे विधान परिषद में अपने भाई राजीव कुमार के साथ सदन का हिस्सा बन गए हैं, जिसके चलते एक ही छत के नीचे दो सगे भाइयों के अलग-अलग राजनीतिक दलों या गठबंधनों से प्रतिनिधित्व करने का एक अनूठा उदाहरण सामने आया है।
फिलहाल, इस चर्चित चुनावी रण के शांत होने के बाद राजद की यह ऐतिहासिक जीत इस बात का एक बड़ा प्रमाण बन गई है कि जब कोई एकजुट विपक्ष सही समय पर जमीनी मुद्दों को जनता के सामने रखता है, तो राजनीति के स्थापित समीकरण पलक झपकते ही बदल सकते हैं।
