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मगधपोस्ट डिकोड बिहार की नदियों की गाद से बनेंगी सड़कें, बाढ़ से मिलेगी राहत? जानिए क्या है 'नदी संजीवनी' योजना

Published: November 3, 2026, 11:37 pm
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पटना: बिहार में हर साल बाढ़ से होने वाली तबाही और दूसरी ओर सड़क निर्माण के लिए मिट्टी की बढ़ती जरूरत, दोनों ही लंबे समय से बड़ी चुनौती रहे हैं। अब राज्य सरकार इन दोनों समस्याओं का एक साथ समाधान तलाशने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इसके लिए नदियों और जलस्रोतों में जमा गाद (Silt) को निकालकर उसका इस्तेमाल सड़क निर्माण में करने की योजना बनाई गई है।

इस पहल को ‘नदी संजीवनी‘ नाम दिया गया है। मंगलवार, 3 नवंबर को केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और बिहार सरकार के बीच इस संबंध में समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। इस दौरान केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी मौजूद रहे।

सरकार का दावा है कि इस पहल से नदियों की जलधारण क्षमता बढ़ाने, जलप्रवाह को बेहतर बनाने और बाढ़ के खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है। वहीं, नदियों से निकाली गई उपयोगी गाद का इस्तेमाल राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में किया जाएगा।

लेकिन सवाल यह है कि क्या नदी की गाद से वास्तव में मजबूत सड़कें बनाई जा सकती हैं? क्या इससे बिहार की बाढ़ की समस्या कम होगी? और इस पूरी योजना से किसानों को क्या फायदा मिल सकता है? आइए समझते हैं।

क्या है बिहार की ‘नदी संजीवनी’ योजना?

नदी संजीवनी योजना का मूल विचार काफी व्यावहारिक है। बिहार की कई नदियों और जलस्रोतों में वर्षों से गाद जमा होती रही है। इससे कुछ स्थानों पर जलस्रोतों की गहराई और पानी को अपने भीतर समाहित करने की क्षमता प्रभावित होती है।

दूसरी तरफ, राष्ट्रीय राजमार्गों और अन्य सड़क परियोजनाओं के निर्माण में बड़ी मात्रा में मिट्टी की जरूरत पड़ती है। इसके लिए निर्माण एजेंसियों को अलग-अलग स्थानों से मिट्टी जुटानी पड़ती है।

सरकार अब इन दोनों जरूरतों को आपस में जोड़ने जा रही है। जिन नदियों और जलस्रोतों में वैज्ञानिक जांच के बाद गाद निकालना जरूरी पाया जाएगा, वहां से इसे निकाला जाएगा। इसके बाद निर्माण कार्य के लिए उपयुक्त पाई गई गाद को सड़क परियोजनाओं तक पहुंचाया जाएगा।

इस तरह नदी की सफाई से निकलने वाला पदार्थ निर्माण कार्य में संसाधन बन सकेगा। हालांकि, हर तरह की गाद सड़क निर्माण के लिए उपयोगी नहीं होती। इसके लिए तकनीकी जांच और निर्धारित मानकों का पालन करना जरूरी होगा।

243 लाख घनमीटर गाद का होगा इस्तेमाल, 16 सड़क परियोजनाएं शामिल

इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका बड़ा दायरा है। केंद्र सरकार की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, बिहार में चल रही 16 राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में लगभग 243 लाख घनमीटर उपयुक्त गाद के इस्तेमाल की योजना है।

इसके अलावा भविष्य की 27 परियोजनाओं में करीब 835 लाख घनमीटर गाद के उपयोग का प्रस्ताव है। यह इस्तेमाल तकनीकी उपयुक्तता और जरूरी मंजूरियों पर निर्भर करेगा।

बिहार में फिलहाल राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की 39 परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इनकी कुल लंबाई लगभग 1,561 किलोमीटर है और इन पर करीब 58,340 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।

वहीं, 11 अन्य परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। इनकी कुल लंबाई लगभग 1,982 किलोमीटर और अनुमानित लागत 1,85,200 करोड़ रुपये बताई गई है।

MOU प्रस्तुत करते हुए माननीय मुख्यमंत्री बिहार

इन परियोजनाओं में मिट्टी और अन्य निर्माण सामग्री की बड़ी जरूरत होगी। ऐसे में नदी से निकाली गई उपयुक्त गाद एक वैकल्पिक संसाधन बन सकती है।

किन नदियों से निकाली जाएगी गाद?

बिहार में गंगा के अलावा कोसी, गंडक, बागमती, फल्गु, सोन और घाघरा जैसी कई प्रमुख नदियां बहती हैं। इनमें से कई नदियों के आसपास के इलाकों में बाढ़ और जलजमाव की समस्या लंबे समय से बनी हुई है।

नदी संजीवनी पहल के तहत गंगा, गंडक, कोसी, सोन, फल्गु, घाघरा समेत अन्य नदियों और जलस्रोतों के चिन्हित हिस्सों में गाद निकालने की योजना है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सभी नदियों की पूरी लंबाई में खुदाई की जाएगी। गाद निकालने का काम तकनीकी सर्वेक्षण के आधार पर निर्धारित स्थानों पर ही किया जाएगा।

इसमें नदी की मौजूदा गहराई, पानी के प्रवाह, तलछट की मात्रा और आसपास के पर्यावरण को ध्यान में रखना होगा।

क्या नदी से गाद निकालने पर बिहार में बाढ़ कम होगी?

यह इस योजना से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।

बिहार में बाढ़ की समस्या केवल नदियों में गाद जमा होने की वजह से नहीं है। नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में भारी बारिश, उत्तर बिहार की नदियों में अचानक बढ़ता जलस्तर, तटबंधों की स्थिति और नदियों के प्राकृतिक बहाव में बदलाव भी इसके प्रमुख कारण हैं।

कई स्थानों पर नदी के तल में गाद जमा होने से पानी के प्रवाह और जलधारण क्षमता पर असर पड़ सकता है। ऐसे क्षेत्रों में वैज्ञानिक तरीके से गाद हटाने से पानी के बहाव और जलनिकासी में सुधार संभव है।

लेकिन केवल गाद निकालने से बिहार को बाढ़ मुक्त कर देना संभव नहीं है। इसके लिए तटबंधों का रखरखाव, नदी के प्राकृतिक बहाव का अध्ययन, जल निकासी व्यवस्था और नेपाल से आने वाले पानी के बेहतर प्रबंधन जैसे उपाय भी जरूरी हैं।

इसलिए नदी संजीवनी योजना को बाढ़ नियंत्रण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा सकता है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता काम के वैज्ञानिक क्रियान्वयन और दीर्घकालिक परिणामों पर निर्भर करेगी।

सड़क निर्माण में कैसे इस्तेमाल होगी नदी की गाद?

नदी से निकली गाद को सीधे सड़क पर डालकर निर्माण नहीं किया जा सकता। इसके लिए सबसे पहले उसकी तकनीकी जांच करनी होगी।

गाद में मिट्टी के कणों का आकार, नमी, प्लास्टिसिटी, कतरनी क्षमता और संघनन जैसे गुण अलग-अलग हो सकते हैं। इनका सड़क की मजबूती और लंबे समय तक टिकाऊ रहने की क्षमता पर सीधा असर पड़ता है।

निर्माण में इस्तेमाल से पहले यह देखना होगा कि संबंधित सामग्री सड़क के किस हिस्से के लिए उपयुक्त है।

उदाहरण के तौर पर:

– सड़क की भराई (Embankment): उपयुक्त मिट्टी का इस्तेमाल सड़क के निर्धारित स्तर तक भराई करने में किया जा सकता है।

– सबग्रेड (Subgrade): आवश्यक तकनीकी गुण पूरे करने वाली सामग्री का उपयोग सड़क की आधारभूत परत में संभव है।

– अन्य निर्माण कार्य: निर्धारित मानकों के अनुसार उपयुक्त सामग्री का इस्तेमाल दूसरे सिविल निर्माण कार्यों में भी किया जा सकता है।

इसके लिए MoRTH के तकनीकी विनिर्देशों और संबंधित IRC मानकों के अनुसार परीक्षण किया जाएगा।

यानी इस योजना की सफलता केवल गाद निकालने पर नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता और सही इस्तेमाल पर भी निर्भर करेगी।

महाराष्ट्र का बुलढाणा मॉडल बना आधार

बिहार में शुरू की जा रही इस पहल के पीछे महाराष्ट्र का बुलढाणा मॉडल भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

इस मॉडल में जलस्रोतों से निकाली गई मिट्टी का इस्तेमाल राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण में किया गया था। इससे एक तरफ जलस्रोतों की गहराई और भंडारण क्षमता बढ़ाने में मदद मिली, तो दूसरी तरफ सड़क निर्माण के लिए मिट्टी का वैकल्पिक स्रोत भी उपलब्ध हुआ।

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने बिहार में भी इसी तरह की व्यवस्था विकसित करने की बात कही है।

हालांकि, बिहार की भौगोलिक परिस्थितियां महाराष्ट्र से अलग हैं। यहां हिमालय से आने वाली नदियों में भारी मात्रा में तलछट पहुंचती है। इसलिए इस मॉडल को लागू करते समय स्थानीय नदी तंत्र और बाढ़ की परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा।

किसानों और आम लोगों को क्या फायदा होगा?

अगर इस योजना को सही तरीके से लागू किया जाता है तो इसका लाभ केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं रहेगा।

  1. कृषि भूमि का संरक्षण: सड़क निर्माण के लिए उपजाऊ कृषि भूमि से मिट्टी निकालने की जरूरत कम हो सकती है। इससे खेती योग्य जमीन को बचाने में मदद मिलेगी।
  2. सिंचाई के लिए पानी: जलस्रोतों के पुनरुद्धार से कुछ क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता और भंडारण क्षमता बेहतर हो सकती है। इसका फायदा किसानों को मिल सकता है।
  3. बाढ़ के प्रभाव में कमी: संवेदनशील स्थानों पर वैज्ञानिक तरीके से गाद हटाने से जलनिकासी में सुधार संभव है।
  4. निर्माण लागत में संभावित कमी: आसपास उपलब्ध उपयुक्त गाद के इस्तेमाल से दूरस्थ स्थानों से मिट्टी लाने और परिवहन पर होने वाला खर्च घट सकता है।
  5. बेहतर सड़क संपर्क: निर्माण सामग्री की उपलब्धता बढ़ने से कुछ सड़क परियोजनाओं को समय पर पूरा करने में मदद मिल सकती है।

बिहार सरकार की गाद प्रबंधन नीति 2026 क्या है?

इस पूरी पहल को व्यवस्थित तरीके से लागू करने के लिए बिहार सरकार ने ‘बिहार जलस्रोत पुनरुद्धार एवं गाद प्रबंधन नीति, 2026‘ तैयार की है।

इस नीति का उद्देश्य नदियों और अन्य जलस्रोतों में जमा गाद का वैज्ञानिक प्रबंधन करना और उसका उपयोगी पुनर्चक्रण सुनिश्चित करना है।

समझौते के तहत बिहार सरकार का सड़क निर्माण विभाग (RCD) नोडल विभाग के रूप में काम करेगा। वहीं, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और राज्य सरकार के बीच समन्वय के लिए एक समिति बनाई जाएगी।

गाद निकालने की प्रक्रिया में कुछ महत्वपूर्ण शर्तें भी रखी गई हैं:

– गाद निकालने से पहले संबंधित जलस्रोत का तकनीकी आकलन किया जाएगा।

– खुदाई केवल स्वीकृत स्थानों और निर्धारित सीमाओं में होगी।

– नदी के किनारों, तटबंधों, पुलों और अन्य संरचनाओं को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।

– निर्माण में इस्तेमाल से पहले गाद की गुणवत्ता की जांच होगी।

– निकाली गई, ढोई गई और इस्तेमाल की गई गाद का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जाएगा।

इससे योजना में पारदर्शिता बनाए रखने और अनियंत्रित खुदाई को रोकने में मदद मिल सकती है।

क्या नदी की गाद से सड़क बनाना पूरी तरह सुरक्षित है?

यहां एक तकनीकी पहलू समझना जरूरी है। नदी की गाद हर जगह एक जैसी नहीं होती। कुछ स्थानों पर इसमें रेत की मात्रा अधिक हो सकती है, जबकि दूसरे स्थानों पर महीन चिकनी मिट्टी और जैविक पदार्थ अधिक मिल सकते हैं।

ऐसी सामग्री की भार वहन क्षमता, पानी के संपर्क में व्यवहार और संघनन की क्षमता अलग-अलग होती है।

यदि बिना उचित परीक्षण के इसका इस्तेमाल सड़क निर्माण में किया गया तो सड़क में धंसाव, असमान बैठने और अन्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

इसके अलावा, जरूरत से ज्यादा गाद निकालना भी नदी के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। इससे नदी तल, किनारों और जलीय पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।

इसलिए वैज्ञानिक सर्वेक्षण, पर्यावरणीय सुरक्षा और निर्माण मानकों का पालन इस परियोजना के लिए बेहद जरूरी होगा।

बिहार के लिए कितना महत्वपूर्ण है नदी संजीवनी मॉडल?

बिहार में बाढ़ और सड़क निर्माण दोनों ही बड़े विकासात्मक मुद्दे हैं। नदी संजीवनी योजना इन दोनों चुनौतियों को एक साथ देखने का प्रयास करती है।

यदि नदी से गाद निकालने का काम वैज्ञानिक तरीके से होता है और निकाली गई सामग्री का सही इस्तेमाल किया जाता है, तो इससे जलस्रोतों के पुनरुद्धार, कृषि भूमि के संरक्षण और सड़क निर्माण में मदद मिल सकती है।

हालांकि, इस योजना का वास्तविक मूल्यांकन तभी संभव होगा जब जमीन पर काम शुरू होगा और इसके परिणाम सामने आएंगे।

बिहार जैसे बाढ़ प्रभावित राज्य में नदी प्रबंधन को केवल आपदा नियंत्रण तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसे जल संरक्षण, कृषि, परिवहन और पर्यावरण के साथ जोड़कर देखना होगा। नदी संजीवनी योजना इसी दिशा में एक नई पहल है।

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क्या नदी संजीवनी योजना लागू होने के बाद बिहार में बाढ़ की समस्या खत्म हो सकती है.?

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