पटना से औरंगाबाद के बीच के सफर की कल्पना करें—वही उबड़-खाबड़ सड़कें, घंटों का ट्रैफिक जाम और थका देने वाली यात्रा। सालों से मगध और मध्य बिहार के यात्री एक ऐसी रेल लाइन का सपना देख रहे हैं जो न केवल उनके सफर को छोटा कर दे, बल्कि विकास के नए द्वार भी खोले। बिहटा-औरंगाबाद रेल परियोजना महज एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों लोगों की उम्मीदों का पुनर्जन्म है जो 18 साल से फाइलों और वादों के बीच अटकी हुई थीं। एक विशेषज्ञ के नजरिए से देखें तो यह परियोजना बिहार के लॉजिस्टिक्स परिदृश्य को बदलने वाला एक ‘स्ट्रैटेजिक कॉरिडोर’ साबित होने वाली है।
18 साल का लंबा इंतज़ार: 2007 की नींव और 2026 की गति
इस परियोजना की औपचारिक शुरुआत 16 अक्टूबर 2007 को हुई थी, जब पटना के पालीगंज में इसकी आधारशिला (foundation stone) रखी गई थी। हालांकि, शुरुआती वर्षों में इसे “कम प्राथमिकता” (low priority) की श्रेणी में डाल दिया गया था। रेलवे का तर्क था कि आरा-सासाराम और पटना-गया जैसी वैकल्पिक रेल लाइनें पहले से मौजूद हैं। इस प्रशासनिक सुस्ती ने न केवल कनेक्टिविटी को प्रभावित किया, बल्कि पूरे क्षेत्र के आर्थिक विकास को भी दो दशकों तक पीछे धकेल दिया।
लेकिन 2026 में परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। अब यह परियोजना ‘PM GatiShakti’ के नेटवर्क प्लानिंग ग्रुप (NPG) की देखरेख में है, जो इसे राष्ट्रीय मास्टर प्लान का हिस्सा बनाता है। बजट में हुई भारी वृद्धि ने इस सुस्त परियोजना में नई ऊर्जा भर दी है।
बिहार में रेल बुनियादी ढांचे के लिए बजट आवंटन में अभूतपूर्व वृद्धि की गई है। 2009-14 के दौरान जहां औसत बजट ₹1,132 करोड़ प्रति वर्ष था, वहीं 2024-25 में इसे बढ़ाकर ₹10,033 करोड़ कर दिया गया है—जो कि लगभग 9 गुना वृद्धि है। यह निवेश बिहार की पुरानी रेल परियोजनाओं को प्राथमिकता के साथ पूरा करने की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।” — रेल मंत्रालय (भारत सरकार)
दो चरणों का मास्टरप्लान: 13 किमी बनाम 107 किमी
तकनीकी विशेषज्ञता और प्रशासनिक सुगमता के लिए इस 120 किलोमीटर लंबी परियोजना को दो प्रमुख चरणों में विभाजित किया गया है:
- प्रथम चरण (अनुग्रह नारायण रोड से औरंगाबाद): यह 12.90 किलोमीटर (लगभग 13 किमी) का खंड है। इसके लिए ₹440.59 करोड़ की राशि स्वीकृत की गई है और वर्तमान में यहाँ निर्माण कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है। मई 2025 से इस छोटे लेकिन महत्वपूर्ण हिस्से पर काम और तेज होने की उम्मीद है।
- द्वितीय चरण (अनुग्रह नारायण रोड से बिहटा): यह परियोजना का मुख्य हिस्सा है, जिसकी लंबाई लगभग 107 किलोमीटर है। यह अरवल के रास्ते बिहटा (पटना) को जोड़ेगी। 30 सितंबर 2025 को रेल मंत्रालय ने इस 117 किमी के कुल स्ट्रेच के लिए ₹3,606.42 करोड़ की बड़ी मंजूरी दी है। इसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) अब प्रशासनिक स्वीकृतियों के अंतिम दौर में है।
पूरी परियोजना की कुल अनुमानित लागत लगभग ₹4,075 करोड़ है।
समय की बचत: पटना अब केवल 2 घंटे दूर
इस रेल लाइन का सबसे प्रभावशाली पहलू है यात्रा के समय में होने वाली भारी कटौती। वर्तमान में पटना से औरंगाबाद की सड़क यात्रा में 3 घंटे से अधिक का समय लगता है। नई रेल लाइन शुरू होने के बाद, यह दूरी घटकर मात्र 2 घंटे रह जाएगी।
यह समय की बचत पटना, अरवल, औरंगाबाद और जहानाबाद जिलों के लगभग 75 लाख निवासियों के लिए सामाजिक-आर्थिक क्रांति की तरह होगी। विशेषज्ञ इसे केवल यात्री परिवहन नहीं, बल्कि कृषि उत्पादों और माल ढुलाई (Freight movement) के लिए एक प्रमुख माध्यम के रूप में देख रहे हैं।
परियोजना के प्रमुख पड़ाव (स्टेशन और हॉल्ट):
इस 120 किमी की लाइन पर कुल 14 स्टेशन और 10 हॉल्ट प्रस्तावित हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, प्रमुख स्टेशन इस प्रकार होंगे:
- बिक्रम
- दुल्हन बाज़ार
- पालीगंज
- बारा
- अरवल
- खभनी
- सावजपुरा
- कलेर
- शमशेर नगर
- दाउदनगर
- अरंडा
- ओबरा
- अनुग्रह नारायण रोड
- भरथौली
इंतजार अभी भी है लंबी
रेल मंत्रालय ने इस पूरी परियोजना को पूरा करने के लिए 31 मार्च 2027 की लक्षित तिथि निर्धारित की है। वर्तमान में पूर्व मध्य रेलवे (ECR) और औरंगाबाद जिला प्रशासन के बीच भूमि अधिग्रहण को लेकर जो समन्वय दिख रहा है, वह इस समय-सीमा को हासिल करने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।
यह परियोजना बिहार के औद्योगिक ढांचे को मजबूत करने, स्थानीय रोजगार पैदा करने और पटना के उपनगरीय क्षेत्रों के विस्तार में मील का पत्थर साबित होगी। अब सवाल यह है: क्या यह नई रेल लाइन बिहार के औद्योगिक और आर्थिक परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल देगी? आपकी क्या राय है?
