औरंगाबाद (बिहार): सर्द हवाओं के बीच औरंगाबाद के ऐतिहासिक सूर्य नगरी ‘देव’ में माहौल भक्तिमय था। मौका था प्रसिद्ध ‘सूर्य महोत्सव’ का। हजारों की भीड़, जगमगाती रोशनी और सजे मंच के बीच जब कुटुंबा के विधायक ललन भुइंया मंच पर चढ़े, तो किसी ने नहीं सोचा था कि वह एक ऐसी बात कह देंगे जो सालों से लोगों के दिलों में दबी थी।
विधायक ने मंच से सीधे बिहार सरकार के मंत्री संतोष कुमार सुमन और वहाँ मौजूद जिला प्रशासन के आला अधिकारियों की ओर मुखातिब होते हुए एक बड़ी मांग रख दी। उन्होंने पुरजोर शब्दों में कहा, “औरंगाबाद जिले का नाम बदलकर ‘देव’ कर दिया जाए।” उनकी इस मांग पर पंडाल में मौजूद भीड़ ने तालियों की गड़गड़ाहट से समर्थन किया। इस एक उदघोष ने औरंगाबाद के ‘पहचान के संकट’ को फिर से राजनीतिक गलियारों और चौपालों की चर्चा में ला खड़ा किया है। आप इस मुद्दे पर क्या विचार रखते हैं नीचे पोल में वोट करिए।
पहचान का संकट और दो शहरों की उलझन
यह मांग अचानक नहीं उठी है। दरअसल, 26 जनवरी 1973 को गया से अलग होकर बना यह जिला आज भी अपनी एक ठोस पहचान के लिए जूझ रहा है। एक तरफ महाराष्ट्र का औरंगाबाद था (जिसका नाम अब छत्रपति संभाजीनगर हो चुका है), और दूसरी तरफ बिहार का यह जिला। अक्सर डाक, रेलवे और सामान्य बातचीत में लोग दोनों शहरों को लेकर भ्रमित हो जाते थे।
लेकिन स्थानीय लोगों का दर्द सिर्फ भ्रम तक सीमित नहीं है। वे मानते हैं कि ‘औरंगाबाद’ नाम मुगलों के समय की एक प्रशासनिक व्यवस्था भर है, जबकि इस मिट्टी की आत्मा ‘देव’ में बसती है। विधायक ललन भुइंया का बयान इसी जन-भावना का प्रकटीकरण था कि हमें किसी शासक के नाम से नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति के नाम से जाना जाना चाहिए।
पत्थरों में दर्ज इतिहास: देव क्यों है खास?
अगर हम इतिहास के पन्ने पलटें, तो ‘देव’ नाम की मांग के पीछे बेहद मजबूत आधार दिखाई देता है। यह केवल एक कस्बा नहीं, बल्कि ‘देवारण्य’ है। यहाँ स्थित त्रेतायुगीन सूर्य मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना भी है। यह देश का एकमात्र सूर्य मंदिर है जिसका मुख्य द्वार पश्चिम की ओर है।
इसके पीछे की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। जनश्रुति है कि एक बार एक विदेशी आक्रांता ने मंदिर को तोड़ने की धमकी दी और चुनौती दी कि अगर इस मंदिर में शक्ति है, तो इसका दरवाजा पूर्व से पश्चिम की ओर हो जाए। मान्यता है कि रातों-रात मंदिर का गर्भगृह पश्चिम की ओर घूम गया।
यहीं पास में राजा ऐल की कहानी भी जिंदा है, जिनका कुष्ठ रोग यहाँ के सूर्य कुंड में स्नान करने और देवताओं के स्वप्न दर्शन से ठीक हुआ था। उमगा की पहाड़ियों पर बने प्राचीन शैव मंदिर और वहां का ‘सहस्रलिंग’—जिस पर एक हजार छोटे शिवलिंग उकेरे गए हैं—यह गवाही देते हैं कि यह क्षेत्र मगध के बौद्ध प्रभाव के बीच हिंदू धर्म का, विशेषकर शैव और सौर परंपरा का एक अभेद्य गढ़ रहा है। यहाँ के ऐतिहासिक किले और उदयपुर के सिसोदिया राजवंश से जुड़े राजा राय भान सिंह और राजा प्रबिल सिंह की कहानियां बताती हैं कि देव का कद एक जिला मुख्यालय से कहीं बड़ा है।
राजनीतिक कसक और संघर्ष का रास्ता
सूर्य महोत्सव के मंच से उठी यह आवाज दरअसल एक पुरानी राजनीतिक टीस को भी बयां करती है। साल 2009 तक ‘देव’ नाम से एक विधानसभा सीट हुआ करती थी। लेकिन परिसीमन के बाद उस सीट का नाम मिटाकर उसे ‘कुटुम्बा’ में मिला दिया गया। स्थानीय लोगों के लिए यह एक बड़ा झटका था। उन्हें लगा कि उनकी ऐतिहासिक पहचान धीरे-धीरे सरकारी नक्शे से मिटाई जा रही है।
इसी डर ने एक आंदोलन को जन्म दिया। ‘जिला देव संघर्ष समिति’ और ‘जनेश्वर विकास केंद्र’ जैसे संगठनों ने गाँव-गाँव ‘जागरूकता रथ’ घुमाना शुरू किया। उनका तर्क सीधा है—”औरंगाबाद शहर से ज्यादा प्रसिद्धि देव की है, तो जिले का नाम देव क्यों नहीं?” विधायक ललन भुइंया द्वारा मंत्री संतोष सुमन के सामने यह मुद्दा उठाना बताता है कि अब यह लड़ाई सड़कों से उठकर सरकार के कानों तक पहुँच चुकी है।
बदलाव की राह: क्या आरा और भभुआ जैसा होगा मॉडल?
नाम बदलना आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं। बिहार में इसके सफल उदाहरण मौजूद हैं। जैसे भोजपुर जिले का मुख्यालय ‘आरा’ है और कैमूर जिले का मुख्यालय ‘भभुआ’ है, वैसे ही औरंगाबाद का नाम बदलकर ‘देव’ या ‘देव धाम’ किया जा सकता है, भले ही प्रशासनिक मुख्यालय औरंगाबाद शहर ही रहे।
प्रशासनिक जानकारों के मुताबिक, इसके लिए राज्य कैबिनेट की मंजूरी के बाद केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय, रेलवे और डाक विभाग से ‘नो ऑब्जेक्शन’ (NOC) लेना होगा। सबसे बड़ी चुनौती दस्तावेजों में सुधार की होगी, लेकिन प्रयागराज और संभाजीनगर के उदाहरण बताते हैं कि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो यह मुमकिन है।
उम्मीदों का नया सवेरा
फिलहाल, सूर्य महोत्सव के बाद से जिले में एक नई बहस छिड़ गई है। लोग मान रहे हैं कि अगर जिले का नाम ‘देव’ होता है, तो यह केवल नाम बदलना नहीं होगा, बल्कि यह क्षेत्र के पर्यटन और विकास के लिए एक ‘ब्रांडिंग’ का काम करेगा।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पुरानी यात्राएं और अब मंत्री संतोष सुमन के सामने उठी मांग, साथ ही वहां मेडिकल कॉलेज बनाने की कवायद—ये सब इशारे हैं कि देव अब उपेक्षा का शिकार नहीं रहेगा। नवीनगर पावर प्लांट की बिजली और ओबरा की कालीन के साथ अगर देव की आध्यात्मिक पहचान जुड़ जाए, तो यह जिला बिहार के नक्शे पर सबसे चमकदार सितारा बन सकता है।
फिलहाल, गेंद सरकार के पाले में है, लेकिन सूर्य मंदिर की छाया में रहने वाले लोगों ने अपनी मन की बात साफ कर दी है—उन्हें अब अपनी पौराणिक पहचान ‘देव’ वापस चाहिए।
