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पूरब का 'चित्तौड़गढ़': Aurangabad के गौरव, शौर्य और 'स्ट्रॉबेरी क्रांति' की गौरवगाथा

Published: January 24, 2026, 12:25 pm
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बिहार के दक्षिण-पश्चिम में, गंगा के उर्वर मैदानों और छोटा नागपुर पठार के ऊबड़-खाबड़ धरातल के बीच औरंगाबाद एक रणनीतिक गलियारे (corridor) के रूप में स्थित है। अद्रि नदी के तट पर और सोन नदी के पूर्वी हिस्से में बसा यह जिला अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण सदियों से मगध साम्राज्य का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। राष्ट्रीय राजमार्ग-19 (ऐतिहासिक ग्रैंड ट्रंक रोड) और NH-139 का संगम होने के कारण यह न केवल व्यापार का केंद्र है, बल्कि प्राचीन भारतीय राज्यकला और आधुनिक औद्योगिक बदलाव का एक जीवंत उदाहरण भी है।

पूरब का चित्तौड़गढ़’: सूर्यवंशी विरासत और पुरातात्विक वैभव

औरंगाबाद को ‘बिहार का चित्तौड़गढ़’ कहा जाना केवल एक उपमा नहीं, बल्कि इसकी सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना का प्रतिबिंब है। 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच राजस्थान से आए सूर्यवंशी और गहड़वाल (Gahadavala) वंश के राजपूत योद्धाओं ने यहाँ अपनी बस्तियां बसाईं। इस विरासत के प्रमाण आज भी पवई, माली और चंदनगढ़ जैसे स्थानों पर स्थित प्राचीन दुर्गों और पुरातात्विक अवशेषों के रूप में मिलते हैं।

यहाँ की राजपूत विरासत का प्रभाव इतना गहरा है कि 1952 के पहले आम चुनाव से लेकर आज तक, यहाँ का राजनीतिक नेतृत्व ऐतिहासिक रूप से बेहद स्थिर रहा है।

Aurangabad Bihar Unknown Facts

“औरंगाबाद को उसकी सूर्यवंशी वंशावली की बड़ी राजपूत आबादी के कारण ‘बिहार का चित्तौड़गढ़’ भी कहा जाता है। 1952 के पहले आम चुनाव से अब तक, इस जिले ने मुख्य रूप से राजपूत प्रतिनिधियों को ही चुना है।”

देव का सूर्य मंदिर: वास्तुकला और आस्था का अद्भुत संगम

औरंगाबाद की पहचान यहाँ के 15वीं शताब्दी के ‘देव सूर्य मंदिर’ और ‘उमगा सूर्य मंदिर’ से है। उमगा के चंद्रवंशी राजा भैरवेंद्र सिंह द्वारा निर्मित यह मंदिर वास्तुकला का एक दुर्लभ चमत्कार है।

जहाँ अधिकांश सूर्य मंदिर पूर्वोन्मुख होते हैं, वहीं देव का यह मंदिर ‘पश्चिम’ की ओर मुख (Westward-facing) किए हुए है। 100 फीट ऊंचे इस पत्थर के मंदिर का शिखर छतरीनुमा है।

देव सूर्य मंदिर की पुरानी तस्वीर
देव सूर्य मंदिर की एक पुरानी तस्वीर

एक लोकप्रिय सांस्कृतिक मान्यता के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा ने एक ही रात में तीन समरूप मंदिरों का निर्माण किया था—देव, उमगा और देवकुण्ड।

मंदिर का संबंध भगवान कृष्ण के पूर्वज राजा ऐल से भी है। माना जाता है कि यहाँ स्थित ‘ब्रह्म कुंड’ में स्नान की परंपरा उन्हीं के समय से चली आ रही है, जो आज भी छठ पूजा के दौरान लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है।

सूखे खेतों में ‘स्ट्रॉबेरी क्रांति’: आर्थिक कायाकल्प

एक समय में ‘पिछड़ा’ और उग्रवाद से प्रभावित माना जाने वाला यह क्षेत्र आज बिहार की ‘न्यू एज इकोनॉमी’ (New Age Economy) का नेतृत्व कर रहा है। कुटुंबा प्रखंड के चिलहकी बीघा गाँव में हुई स्ट्रॉबेरी की खेती ने पूरे राज्य के लिए एक मिसाल पेश की है।

बृज किशोर mehtaa
फोटो साभार: बिहार कृषि विश्वविद्यालय, भागलपुर

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस बदलाव का श्रेय किसान बृज किशोर मेहता को दिया जाता है। उनकी प्रेरणा का स्रोत उनका अपना बेटा था, जो हरियाणा के हिसार में एक प्रवासी श्रमिक के रूप में स्ट्रॉबेरी के खेतों में काम करता था। मेहता ने 2013 में मात्र 7 पौधों से शुरुआत की और आज यह एक सफल उद्यम बन चुका है।

मेहता ने 2017-18 के दौरान मात्र 6 एकड़ भूमि से ₹10,82,960 का शुद्ध लाभ प्राप्त किया।

यहाँ ‘फेस्टिवल’, ‘विंटर डॉन’ और ‘स्वीट चार्ली’ जैसी किस्मों की पैदावार हो रही है। इस सफलता को देखते हुए बिहार सरकार अब स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए ₹1.12 लाख प्रति हेक्टेयर की सब्सिडी भी प्रदान कर रही है।

बिहार की ‘ऊर्जा राजधानी’ और औद्योगिक रूपांतरण

औरंगाबाद आज बिहार को बिजली के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की धुरी है। नवीनगर सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट यहाँ का औद्योगिक गौरव है।

इस प्रोजेक्ट की कुल क्षमता 4380 मेगावाट से अधिक है। मई 2025 में प्रधानमंत्री द्वारा इसके दूसरे चरण (Stage II) की आधारशिला रखी गई, जिसमें ₹29,930 करोड़ का निवेश किया जा रहा है।

यहाँ सुपरक्रिटिकल तकनीक और ‘एयर-कूल्ड कंडेनसर’ का उपयोग किया जा रहा है, जो पानी की खपत को काफी कम करता है।

औद्योगिक प्रगति के साथ-साथ यहाँ मगही पान (जिसे GI टैग प्राप्त है) की खेती देव प्रखंड में व्यापक रूप से की जाती है, जो जिले की आर्थिक पहचान में चार चाँद लगाती है।

मगध का बौद्धिक गौरव: बाणभट्ट और मगही भाषा

शौर्य के साथ-साथ यह भूमि ज्ञान की भी रही है। प्राचीन ‘प्रीतिकूट’ (आधुनिक पीरू) महान संस्कृत कवि बाणभट्ट की जन्मस्थली है, जो राजा हर्षवर्धन के राजकवि थे। यहाँ की मुख्य भाषा ‘मगही‘ है, जिसका उद्भव सीधे तौर पर प्राचीन ‘मागधी प्राकृत’ से हुआ है। यह भाषाई निरंतरता औरंगाबाद को सीधे प्राचीन मगध की बौद्धिक जड़ों से जोड़ती है।

राजा नारायण सिंह: 1781 का ऐतिहासिक प्रतिरोध

औरंगाबाद के स्थापना दिवस पर हमें राजा नारायण सिंह (सीरिस और कुटुंबा के जमींदार) की वीरता को याद करना चाहिए। 1781 में जब वाराणसी के राजा चैत सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया, तब राजा नारायण सिंह उनके सबसे मजबूत सहयोगी बनकर उभरे।

राजा नारायण सिंह
राजा नारायण सिंह

उन्होंने राजस्व देने से इनकार कर दिया और अपनी 1500 ‘मैचलोकमेन’ (बंदूकधारी) की सेना को अरगूर दर्रे (Argoor pass) पर तैनात किया ताकि ब्रिटिश सेना को बीच में ही रोका जा सके।

हालांकि उन्हें गिरफ्तार कर पटना में कैद कर दिया गया, लेकिन उनके स्वाभिमान के आगे झुकते हुए अंग्रेजों को उन्हें रिहा करना पड़ा और 1790 में उन्हें उनकी जागीर वापस कर दी गई। वे बिहार के उन शुरुआती योद्धाओं में से थे जिन्होंने औपनिवेशिक सत्ता की नींव हिला दी थी।

विरासत और भविष्य का संतुलन

औरंगाबाद की यात्रा मगध के प्राचीन साम्राज्यों से शुरू होकर आज के एक विकसित औद्योगिक और बागवानी हब तक पहुँच चुकी है। एक ओर जहाँ देव और उमगा के मंदिर इसकी आध्यात्मिक विरासत को सहेजते हैं, वहीं नवीनगर के पावर प्लांट और चिलहकी बीघा के स्ट्रॉबेरी के खेत इसके ‘आकांक्षी’ (Aspirational) भविष्य को गढ़ रहे हैं।

आज औरंगाबाद हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न के साथ छोड़ता है: “क्या हम अपनी ऐतिहासिक जड़ों और आधुनिक तकनीक के बीच औरंगाबाद की तरह तालमेल बिठाने के लिए तैयार हैं?” यह संतुलन ही किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति का आधार है।